

"झारखंड की लुगुबुरु पहाड़ियों की प्राचीन मौखिक विरासत को अब 350 पन्नों की एक कॉफी टेबल बुक के जरिए दुनिया भर में पहचाना जाएगा।"
झारखंड के बोकारो जिले में स्थित करीब 2,000 फीट ऊंची लुगुबुरु पहाड़ी संताल समाज की आस्था और परंपरा का एक जीवंत केंद्र है। अब तक लोकगीतों और मौखिक स्मृतियों में जीवित रही इस सभ्यता की गाथा को वरिष्ठ पत्रकार और लेखक डॉ. सोमनाथ आर्य ने अपनी नई पुस्तक 'लुगुबुरु घंटाबाड़ी: संताल आदिवासियों का संविधान' में सहेजा है। 350 पन्नों की यह कॉफी टेबल बुक इस क्षेत्र के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को एक व्यापक दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत करती है।
पुस्तक निर्माण में फिनलैंड की कंपनी सॉफ्टा एआई आरएंडडी लिमिटेड और लुगुबुरु घंटा बाड़ी धोरोमगढ़ के अध्यक्ष बबुली सोरेन का विशेष सहयोग रहा है। लेखक का मानना है कि लुगुबुरु की विरासत को समझने के लिए केवल लिखित दस्तावेज काफी नहीं हैं, बल्कि यहां के प्राकृतिक स्थल जैसे दोरबार चट्टान, सीता नाला और धोरोम दोलान गुफा संताल समुदाय के सामूहिक इतिहास के साक्षी हैं। यह पुस्तक लुगुबुरु को केवल एक धार्मिक स्थल के बजाय संताल संस्कृति की पहचान के केंद्र के रूप में स्थापित करती है।

इस महत्वपूर्ण कृति की प्रस्तावना राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा लिखी गई है, जिसमें उन्होंने लुगुबुरु को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का सशक्त माध्यम बताया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस पुस्तक को संताल संविधान की परंपरा को संजोने वाला एक ऐतिहासिक कार्य करार दिया है। इसके अलावा, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और राज्य सरकार के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने भी इस पहल की सराहना की है, जो झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पटल पर ले जाने का प्रयास है।
गौरतलब है कि लुगुबुरु को झारखंड में राजकीय महोत्सव का दर्जा हासिल है, जहां हर साल कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर देश-विदेश से संताल समुदाय के लोग एकजुट होते हैं। डॉ. सोमनाथ आर्य की यह सातवीं पुस्तक मौखिक परंपरा को लिखित रूप देकर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित करने की एक बड़ी कोशिश है। यह कार्य न केवल झारखंड बल्कि पूरे देश के जनजातीय इतिहास और गौरवशाली परंपराओं को समझने में शोधकर्ताओं और आम पाठकों के लिए एक मार्गदर्शक का काम करेगा।





