

"झारखंड में प्रकृति और भाई-बहन के स्नेह के प्रतीक करम पर्व पर गांवों से लेकर शहरों तक उत्सव का माहौल रहा। पारंपरिक गीतों और मांदर की थाप पर देर रात तक अखड़ा सजे रहे।"
झारखंड की मिट्टी में रची-बसी लोकसंस्कृति का रंग एक बार फिर पूरे शबाब पर नजर आया जब राज्यभर में करम पर्व धूमधाम से मनाया गया। गिरिडीह समेत झारखंड के अलग-अलग हिस्सों में गांवों से लेकर शहरों तक उत्सव का माहौल रहा, जहां कहीं करम डाली की पूजा हुई तो कहीं पारंपरिक गीतों की गूंज सुनाई दी। यह पर्व सिर्फ पूजा का अवसर नहीं है, बल्कि प्रकृति, कृषि, सामुदायिक जीवन और भाई-बहन के अटूट स्नेह का एक अनूठा उत्सव है जो झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करता है।
पर्व के दौरान विभिन्न समुदायों की बहनों और युवतियों ने अपने भाइयों की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और खुशहाल जीवन की कामना के साथ कठिन उपवास रखा। शाम के समय करम डाली स्थापित कर विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की गई, जिसमें जावा की पूजा भी शामिल रही। पूजा संपन्न होने के बाद जैसे ही लोकगीतों की शुरुआत हुई, पूरा माहौल उत्सव में तब्दील हो गया और पारंपरिक परिधानों में सजी महिलाओं ने करम डाली के चारों ओर नृत्य किया।

करम गीतों में भाई-बहन के पवित्र रिश्ते के साथ-साथ प्रकृति, खेती-किसानी, सामुदायिक जीवन और गहरी लोक आस्था की अद्भुत झलक दिखाई दी। इस दौरान नई पीढ़ी भी बढ़-चढ़कर इस परंपरा से जुड़ती नजर आई, जिससे यह साबित होता है कि यह लोकपर्व आज भी अपनी पुरानी जड़ों से मजबूती से जुड़ा हुआ है। मांदर और अन्य पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप ने झारखंड की लोकधुनों को और अधिक जीवंत बना दिया, जिससे हर कोई झूम उठा।
गिरिडीह के ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी क्षेत्रों तक करम पर्व का यही मनमोहक रूप देखने को मिला, जहां पूजा स्थलों पर महिलाओं की भारी उपस्थिति रही। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी गांवों के अखड़ों में पूरी तरह जीवंत है। करम डाली के सामने केवल पूजा-अर्चना ही नहीं होती, बल्कि गीत, नृत्य और सामूहिकता के जरिए झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत लगातार आगे बढ़ रही है।





