

"पेरिस के एफिल टावर में स्वामीनारायण संप्रदाय के संतों के दौरे के दौरान महिला कर्मचारियों को कार्यस्थल से हटाने का मामला सामने आया है, जिससे फ्रांस में लैंगिक समानता को लेकर बड़ी बहस छिड़ गई है।"
फ्रांस का मशहूर एफिल टावर इन दिनों एक अजीबोगरीब विवाद के केंद्र में है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, स्वामीनारायण संप्रदाय से जुड़े करीब 100 संत शनिवार को एफिल टावर के दौरे पर पहुंचे थे। इस दौरान आरोप है कि संतों की धार्मिक मान्यताओं का सम्मान करने के नाम पर महिला कर्मचारियों को उनके सामान्य कार्यस्थलों से हटाकर दूसरे विभागों में भेज दिया गया। इतना ही नहीं, कुछ महिलाओं को टावर के खास हिस्सों में जाने से भी रोकने की बात सामने आई है।
एफिल टावर के संचालन से जुड़ी कंपनी 'सेटे' (SETE) ने स्वीकार किया है कि प्रतिनिधिमंडल की ओर से महिला कर्मचारियों के साथ संपर्क सीमित रखने का अनुरोध किया गया था। कंपनी ने स्पष्ट किया कि हालांकि वे धार्मिक मान्यताओं का सम्मान करना चाहते थे, लेकिन इस तरह की शर्तों को स्वीकार करना अनिवार्य नहीं था। इस घटना के बाद फ्रांस में लैंगिक समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
यह पूरा मामला स्वामीनारायण संप्रदाय की लगभग 200 साल पुरानी परंपरा से जुड़ा है, जिसके तहत संतों को महिलाओं से बातचीत, स्पर्श और निकट संपर्क से बचने का कड़ा निर्देश होता है। फ्रांस जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में, जहां लैंगिक समानता सार्वजनिक जीवन का एक प्रमुख सिद्धांत है, इस तरह की घटना ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। लोग अब चर्चा कर रहे हैं कि क्या किसी निजी धार्मिक समूह की मान्यताओं के लिए सार्वजनिक स्थानों पर नियमों में बदलाव करना सही है।
फ्रांसीसी विदेश मंत्रालय ने इस घटना पर टिप्पणी करते हुए इसे एक निजी संस्था से जुड़ा मामला बताया है। हालांकि, सोशल मीडिया पर लोग इस बात पर बहस कर रहे हैं कि कार्यस्थल पर समानता और धार्मिक आस्था के बीच एक स्पष्ट सीमा रेखा होनी चाहिए। एफिल टावर विवाद अब केवल एक दौरे तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सार्वजनिक संस्थानों में धार्मिक और व्यक्तिगत अधिकारों के टकराव का प्रतीक बन गया है।


