

"दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में एक 36 साल पुरानी पांच मंजिला इमारत के ढहने से पांच लोगों की मौत हो गई। शुरुआती जांच में बेसमेंट की खुदाई के दौरान बरती गई घोर लापरवाही मुख्य कारण मानी जा रही है।"
राजधानी दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में रविवार को एक भीषण हादसा हुआ, जहां 36 साल पुरानी पांच मंजिला इमारत अचानक ताश के पत्तों की तरह ढह गई। इस हृदयविदारक घटना में पांच लोगों ने अपनी जान गंवा दी, जबकि तीन अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। मलबे के नीचे दबे लोगों को निकालने के लिए बचाव दलों को घंटों कड़ी मशक्कत करनी पड़ी, जिसके बाद हादसे की भयावहता सामने आई।
प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई है कि इमारत के बेसमेंट में निर्माण कार्य और खुदाई चल रही थी। बताया जा रहा है कि खुदाई के दौरान एक मुख्य पिलर खिसक गया, जिससे पूरी इमारत का संतुलन बिगड़ गया और वह मलबे में तब्दील हो गई। सवाल यह उठता है कि इतनी पुरानी इमारत में बेसमेंट की खुदाई करने से पहले क्या किसी स्ट्रक्चरल इंजीनियर से इसकी सुरक्षा की तकनीकी जांच कराई गई थी?
इस मामले में नगर निगम (MCD) की भूमिका भी कटघरे में है, क्योंकि रिकॉर्ड के अनुसार यह इमारत 'खतरनाक' श्रेणी में नहीं थी। यह एक बड़ा विरोधाभास है कि जिस इमारत को सुरक्षित माना जा रहा था, वह मामूली खुदाई के दौरान ही धराशायी हो गई। क्या वहां नियमों का उल्लंघन करके अवैध निर्माण हो रहा था और स्थानीय प्रशासन इस खतरनाक गतिविधि से अनजान था, यह जांच का प्रमुख विषय है।
फिलहाल, पुलिस ने इमारत के मालिक हरीराम और अन्य संबंधित लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है। लेकिन केवल एक गिरफ्तारी से यह सवाल खत्म नहीं होते कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है? यह हादसा सिस्टम की विफलता को उजागर करता है, जहां समय रहते खतरे को भांपने में नाकाम रहने का खामियाजा पांच मासूम लोगों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ा है।

